"कहानी"

"केमिस्ट्री :रसायन विज्ञान नहीं वरन् प्रेमविज्ञान"
वैसे तो आप सभी ने दोनों केमिस्ट्री के बारे में थोड़ा....... बहुत पढ़ रखा होगा। लेकिन रसायन विज्ञान वाली केमिस्ट्री को छोड़कर यदि हम बात करें ह्रदय के साथ जचने वाली केमिस्ट्री की तो वो कुछ हट के है, उसमे प्रेम, आकांक्षा, शुभारंभ, अधिगम, दर्द - खुशी आदि का समावेश होता है!
(अक्सर कहा जाना वाला वाक्य "उनकी केमिस्ट्री अच्छी हैं")
एक किस्सा है कक्षा 12वीं का ➡
️में हमेशा की तरह आज भी अग्रिम रेखीय पंक्ति में ठीक उसी प्रकार बैठा था जिस प्रकार किसी यौगिक के कोनों में 180 डिग्री पर अवस्थित बंध कोण............
आज वह किसी प्रबल तत्व सी आयी और मेरे पास प्रश्न हल के बहाने बैठ गयी। कालांश में टीचर अनुपस्थित होने के कारण उसने मुझे अपने प्यार विलयन में घोलने का प्रयास किया। में ठहरा एक्वारेजिया (सभी में घुलित) सो हाथोहाथ घुल गया।
रिएक्शन होती उससे पहले ही बीच में नकारात्मक उत्प्रेरक (मास्टर) आ ठहरा.......
हम दोनों पुनः धनात्मक उत्प्रेरक की दुआ कर रहे थे। वास्तव में हम दोनों एक दूसरे को जैविक क्रियान्वयन(बाई बायो मॉलिक्यूल) से संलग्न करना चाहते थे। लेकिन रासायनिक बाध्यताऐं इसे सहजता से स्वीकारने वाली कहाँ थी.............!
एक दिन सदा की तरह क्लास लगी, आज वह सायद पूर्ण रूप से घुलने के मूड में थी। फिर वही बहाना......
मुझे पूछा यार ये "हाइजेनबर्ग का सिद्धांत" क्या है, थोड़ा प्रेमरुपी ट्रिक में समझाना ताकि पूरा समझ में आ जाए।
...... मेने उन्हें साधारण शब्दों में समझाया कि "अनिश्चितता का सिद्धांत" कहता है कि यदि प्यार करो तो "लछ" (नाटक) छोड़ने पड़ेंगे और "लछ"   करोगे तो प्यार... दोनों का अस्तित्व बरकरार शायद ही रहें, सामान्य शब्दों में यही बर्ग कहना चाहता है, और मैंने उस मूर्ख को मूर्ख बनाने के लिए कहा कि बर्ग ने भी प्यार का प्रायोगिक सत्यापन किया था, छाया बोली हैं...................!
मेने कहा हैं नहीं हाँ।
उसने धीरे से पूछा...... फिर यह घुलनशीलता का सिद्धांत क्या होता है।
मैंने कहा ये तो मुझे भी पता नहीं...... बोली तुम्हें सब पता है सही सही बताओ!
अब उसने मेरे ह्रदय के गहनाधिकगहन स्थान पर अपना "मालिया" बना लिया था। अर्थात  मेरे बारे में सब कुछ जानने लग गई थी।
फिर मैंने भी भावनाओं का कदर करना समझा और एक ही पंक्ति में "समान समान को प्यार करता है" से चरितार्थ कर डाला।
वह मुझे हमेशा अपने प्रेम राग-घोलरूपी विलयन, में घोले रहने का प्रयास करती रहती.......
मैं भी  उसके इस निजी प्रयास पर खरा उतराता। अंतत एक दिन पूर्णतः धनात्मक उत्प्रेरकों की उपस्थिति में रिएक्शन सम्पूर्ण होने लगती है...... लेकिन दुर्भाग्य से बीच में ज्वलनशील पदार्थ सल्फ्युरिक अम्ल(उसका भाई) आ जाता है और हम पात्र समेत विस्फ़ोट हो जाते है।
✍️Rajendra S Charan Bijeri
फोटो: Kapil Joshi की वॉल से साभार!

Comments

Popular posts from this blog